स्थानीय जनजतियों पर मँडराता ख़तरा एवं सरकारी तंत्र का हमला

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भारत के आदिवासियों पर साम,दाम,दंड,भेद की नीति अपनाकर मोदी सरकार और संरक्षणवादियों के द्वारा निरंतर हमले किए जा रहे है। वे अपने जीवन, ज़मीन और उसके अस्तित्व को बचाए रखने के लिए विभिन्न प्रकार के खतरों का सामना कर रहे हैं।

 

वन अधिकार अधिनियम के विरोध में संरक्षणवादियों द्वारा लाए गए एक मामले में, फरवरी 2019 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 80 लाख आदिवासी लोगों और अन्य पारंपरिक मूल निवासियों को बेदखल करने का आदेश दिया हैं।

 

उसी समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने सख़्त वनविहीन वन कानूनों के माध्यम से आदिवासियों के वन अधिकारों छीनने की कोशिश करी है। यह कानून वन रक्षकों को, आदिवसियों को बेरहमी से गोली मारने की अनुमति देगा, और वन अधिकार अधिनियम को गलत तरीके से कमजोर करता हैं।

 

भारत के आदिवासी लोगों के लिए, वन अधिकार कानून एक महत्वपूर्ण कानून है जो उन्हें जंगलों के उपयोग, संरक्षण और प्रबंधन के व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है।


यह कानून भारत के पारंपरिक आदिवासियों पर हुए ‘ऐतिहासिक अन्याय ’के निवारण के लिए बनाया गया था। इस बात के बढ़ते सबूत के बावजूद कि आदिवासी लोग से बेहतर वनों का संरक्षण और कोई नहीं कर सकता है, मोदी सरकार और संरक्षणवादियों द्वारा इस कानून को निरंतर कमज़ोर किया जा रहा है। 

 

मोदी सरकार नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर की भी योजना बना रही है, इसके अंतर्गत हर भारतीय को विभिन्न सरकारी पहचान पत्रों के माध्यम से अपनी पहचान प्रमाणित करनी होगी। लेकिन करोड़ों आदिवासियों के पास सरकारी मान्यता प्राप्त पहचान पत्र ही नहीं हैं, जो यह प्रमाणित कर पाये की वे भारत के नागरिक है। ऐसे में वे देशविहीन हो जाएंगे और उन्हें निरोध केंद्रों पर भेज दिया जाएगा। यह विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम उन लोगों को सुरक्षा प्रदान करता है जो अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सकते हैं, लेकिन यह कुछ धर्मों से संबंधित हैं, इसमे हिंदू, जैन, सिख, बौद्ध और ईसाई धर्म  शामिल हैं परंतु इस्लाम नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदिवासी मान्यताएं किसी भी स्वीकृत धर्मों की सूची में नहीं हैं।

 

“सीएए / एनआरसी का आदिवासियों पर भयानक प्रभाव पड़ेगा। आदिवासियों को उनकी नागरिकता से वंचित कर दिया जाएगा, उन्हें हिरासत में लेकर शिविरों भेज दिया जाएगा। उन्हे घुसपैठिया घोषित करके उनकी ज़मीनों पर विभिन्न उद्योगों को पुनर्वासित किया जाएगा। यह अस्वीकार्य है। आदिवासी देश के पहले निवासी हैं, उन्हें सीएए / एनआरसी से बाहर रखा जाना चाहिए। उनकी ज़मीन, क्षेत्र और संसाधनों की रक्षा की जानी चाहिए।” ग्लैडसन डुंगडुंग, आदिवासी कार्यकर्ता और लेखक।

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भारत के मूल निवासियों एवं आदिवासी लोगों के साथ एकजुटता में खड़े होकर और उनके अधिकारों पर इस हमले को रोकने में मदद करें #IndigenousUnderAttack